अपने जीवन के अंतिम 25 वर्षों में औरंगज़ेब दक्षिण भारत के युद्धों में फँसा रहा। मराठों के छापामार युद्ध और संभाजी महाराज (जिन्हें उसने नृशंसता से मारा) की मृत्यु के बाद भी विद्रोह नहीं रुका। उसकी नीतियों ने राजपूतों, सिखों, जाटों, सतनामियों और मराठों को एक साथ खड़ा कर दिया। 1707 में उसकी मृत्यु के समय तक मुगल साम्राज्य थक चुका था। उसने स्वीकार किया कि "मैं अकेला आया और अकेला जाऊँगा। मेरा जीवन व्यर्थ गया।" उसकी कब्र पर लिखा है: "खुला आसमान मेरी छत है, और धरती मेरी चिता।"
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औरंगज़ेब एक जटिल व्यक्तित्व था – वह एक कट्टर अनुयायी था लेकिन साथ ही एक कुशल प्रशासक भी। वह न्यायप्रिय था, लेकिन उसका न्याय अक्सर कठोर और असहिष्णु था। उसने मुगल साम्राज्य को अपने चरम विस्तार तक पहुँचाया, लेकिन उसी विस्तार ने साम्राज्य की नींव को हिला दिया। Aurangzeb The Man And The Myth In Hindi Pdf